'जंगल में मोर नाचा, किसने देखा?' भोरमदेव अभयारण्य में रपटा नहीं, 'भ्रष्टाचार का महल' बना रहे रेंजर साहब!


कबीरधाम।
मशहूर कहावत है—"जंगल में मोर नाचा, किसने देखा?" कबीरधाम जिले के भोरमदेव अभयारण्य में इन दिनों इस कहावत को वन विभाग के कुछ जिम्मेदार चरितार्थ करने में जुटे हैं। अभयारण्य के शांत जंगलों की आड़ में विकास कार्यों के नाम पर जो 'खेल' चल रहा है, उसे देखकर तो यही लगता है कि साहब मानकर बैठे हैं कि जंगल के भीतर चल रही उनकी कलाकारी को देखने वाला कोई नहीं है।

ताजा मामला भोरमदेव अभयारण्य क्षेत्रांतर्गत रपटा निर्माण कार्य का है। यहां नियमों को ताक पर रखकर, कायदे-कानूनों को नदी में बहाकर निर्माण कार्य को अंजाम दिया जा रहा है।



मिट्टी वाली रेत और 'पतला' सरिया: वाह साहब की इंजीनियरिंग
!


चर्चा है कि रपटा निर्माण में गुणवत्ता की ऐसी "धज्जियां" उड़ाई जा रही हैं कि खुद कंक्रीट भी शरमा जाए। नियम विरुद्ध जाकर जंगल की ही नदी से निकाली गई मिट्टी युक्त घटिया रेत का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। इतना ही नहीं, रपटे को मजबूती देने के लिए जो सरिया लगाया जा रहा है, वह भी स्वीकृत एस्टीमेट प्राकलन के मापदंडों से कोसों दूर है। अब सवाल यह उठता है कि पहली ही मानसूनी बारिश में जब यह रपटा बहेगा, तो इसका जिम्मेदार कौन होगा? वन्यजीव या फिर वह जनता जिसका पैसा इस घटिया निर्माण में स्वाहा किया जा रहा है?

'वीवीआईपी' परिक्षेत्र अधिकारी: फोन उठाना शान के खिलाफ!


इस पूरे निर्माण कार्य को अपनी 'पारखी नजरों' के सामने अंजाम दिलवा रहे हैं वन परिक्षेत्र अधिकारी किशोर कुमार साहू। इलाके में चर्चा है कि साहू जी खुद को किसी सूबे के राजा या वीवीआईपी से कम नहीं समझते। उनकी व्यस्तता का आलम यह है कि अभयारण्य से जुड़ी किसी भी जानकारी या जनता की समस्या के लिए जब जिले के जागरूक पत्रकार उन्हें फोन करते हैं, तो साहब फोन उठाना अपनी तौहीन समझते हैं। घंटी बजती रहती है और साहब अपने वीवीआईपी कबीले में मस्त रहते हैं। शायद साहब भूल गए हैं कि वे जनता के सेवक हैं, किसी रियासत के नवाब नहीं।

जब सिर पर हो 'हाथ', तो डरने की क्या बात?

आखिर वन परिक्षेत्र अधिकारी किशोर कुमार साहू के इस कथित घमंड और लापरवाही का राज क्या है? गलियारों में दबी जुबान से चर्चा है कि साहब के सिर पर क्षेत्रीय नेताओं और विभागीय बड़े साहब जिला वनमण्डल अधिकारी का 'अभय हस्त' आशीर्वाद है। जब रक्षक ही भक्षक को मौन सहमति दे दे, और नेताओं की सरपरस्ती हासिल हो, तो फिर नियम-कायदों की परवाह किसे होती है? इसी शह के दम पर रपटे के नाम पर 'कागजी और घटिया' विकास की नींव रखी जा रही है।
साहब याद रखें... लोकतंत्र में जनता ही 'लोहा' है
नेताओं की चाटुकारिता और बड़े अफसरों की मेहरबानी से कुर्सी पर बैठकर पत्रकारों के फोन से दूरी बनाना और जंगल की संपदा का मनमाना इस्तेमाल करना कुछ समय के लिए सुखद हो सकता है। लेकिन साहब को यह नहीं भूलना चाहिए कि यह लोकतंत्र है। जब इस घटिया निर्माण की परतें खुलेंगी और मामला उच्च स्तर पर गूंजेगा, तो न तो नेताओं का वरदहस्त काम आएगा और ना ही डीएफओ साहब का संरक्षण।

देखना यह है कि इस खबर के बाद भी साहब का 'वीवीआईपी' चश्मा उतरता है या फिर वे कबीरधाम की जनता के पैसों पर इसी तरह 'मिट्टी युक्त' विकास की इमारतें खड़े करते रहेंगे।

Post a Comment

0 Comments
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.